निर्मल दृष्टि: जानवर, बच्चे और मनुष्य की चेतना
कभी गौर किया है — सबसे भयंकर जानवर की आँखों में भी एक अजीब सी गहराई और पवित्रता होती है। वहाँ छल नहीं होता, कोई चाल नहीं, कोई परत नहीं। जब वे क्रोधित होते हैं, तो क्रोध को पूरी तरह जीते हैं; जब शांत होते हैं, तो पूर्ण शांति में रहते हैं। उनका हर भाव प्राकृतिक और सच्चा होता है।
अब मनुष्य की आँखों को देखिए — कितनी परतें हैं उनमें। कभी मुस्कुराते हैं, लेकिन भीतर डर छिपा होता है; कभी शांत दिखते हैं, पर भीतर जलन और चिंता बसती है। क्यों? क्योंकि मनुष्य ने अपनी चेतना को परंपराओं, सामाजिक नियमों और अनुभवों के जाल में बांध लिया है। उसका असली “मैं” कैद हो गया है, जो खुलकर सांस लेने को तरसता है।
जानवर और बच्चे एक समान हैं — वे बनते नहीं, बस होते हैं।
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खुशी में हँसते हैं,
दुख में रोते हैं,
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क्रोध में गुस्सा करते हैं और तुरंत भूल जाते हैं।
उनका मन प्रवाहमान है, जैसे बहता झरना। इसलिए उनकी आँखों में गंदगी नहीं जमती, वहाँ कोई नकल या दिखावा नहीं होता। वे जो हैं, वही दिखते हैं।
मनुष्य की चुनौती
मनुष्य ने अनुभव को रोकना सीख लिया है। उसने अपने भीतर दीवारें खड़ी कर ली हैं। अब वह भावनाओं को दबाकर एक “सभ्य” मुखौटा पहन लेता है। इसी कारण उसकी आँखों से वह निर्मलता चली जाती है जो जानवरों और बच्चों में सहज रूप से होती है।
आत्ममुक्ति की दिशा
असली आध्यात्मिकता इस निर्मलता की ओर लौटना है। आत्म मुक्ति तब होती है जब हम अपने भीतर की सारी परतें तोड़ दें, और फिर से बच्चों जैसी सहजता और जानवरों जैसी प्रामाणिकता पा लें।
जब मनुष्य भावनाओं को दबाता नहीं बल्कि उन्हें पूरी तरह जीता है, तभी भीतर शुद्धता जन्म लेती है। यही शुद्धता हमारी दृष्टि को पवित्र बनाती है — वही दृष्टि जो जंगल में शेर की आँखों में चमकती है और बच्चे की हँसी में झलकती है।
अंतर्निहित सत्य
असली आध्यात्मिकता धर्म, ग्रंथ या योग तक सीमित नहीं; वह उस क्षण में है जब तुम बिना डर, बिना मुखौटे, बिना दिखावे के स्वयं को देखते हो। जो अपने भीतर के झरने को बहने देता है — वही निर्मल, वही मुक्त, वही सच्चा होता है।
