प्रस्तावना: ज्ञान की वह लौ जिसने पूरी दुनिया को रोशन किया
आज से लगभग डेढ़ हज़ार वर्ष पहले, भारत के एक कोने में एक ऐसा विश्वविद्यालय था जहाँ दुनिया भर के छात्र ज्ञान की तलाश में आते थे। यहाँ के पुस्तकालय की इतनी अधिक पुस्तकें थीं कि उन्हें जलाने में तीन महीने से अधिक का समय लगा। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि नालंदा विश्वविद्यालय की वास्तविकता थी। आइए, इस अद्भुत शिक्षा केंद्र के इतिहास में गहरे उतरते हैं।
भाग 1: स्थापना और प्रारंभिक इतिहास
कब और किसने बनाया?
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 5वीं शताब्दी ईस्वी में गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त प्रथम (४१५-४५५ ई.) ने की थी। इसके बाद के गुप्त शासकों ने भी इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
नामकरण: 'नालंदा' नाम कैसे पड़ा?
'नालंदा' नाम की उत्पत्ति के पीछे कई मान्यताएँ हैं:
नालम+दा: कहा जाता है कि यहाँ एक पेड़ के नीचे बैठे भगवान बुद्ध ने 'नालम' (कमल का डंडा) दान (दा) किया था।
नर+द: जिसका अर्थ है "जो ज्ञान देता है"।
नाग+द: क्योंकि यह क्षेत्र नाग जाति का केंद्र था।
भाग 2: विश्वविद्यालय का स्वर्णिम काल: वैभव और विस्तार
भौतिक संरचना और वैश्विक महत्व
नालंदा एक पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था, जो अपनी भव्य वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध था।
विशाल परिसर: इसका परिसर लगभग १४ हेक्टेयर (३५ एकड़) में फैला हुआ था, जो एक विशाल शहर के समान था।
आठ विशाल भवन: परिसर में आठ विशाल भवन थे, जिनमें ३०० से अधिक कक्षाएं थीं।
१० मंदिर और अनेक ध्यान कक्ष: छात्रों के लिए अध्ययन और ध्यान के लिए विशेष स्थान।
छात्रावास और व्यक्तिगत कमरे: लगभग १०,००० छात्रों और २,००० शिक्षकों के रहने की व्यवस्था थी।
शैक्षणिक व्यवस्था: क्या और कैसे पढ़ाया जाता था?
नालंदा की शिक्षा प्रणाली अत्यंत उन्नत और व्यवस्थित थी।
प्रवेश परीक्षा: नालंदा में प्रवेश पाना आसान नहीं था। छात्रों को एक कठोर मौखिक परीक्षा देनी होती थी, जिसमें से केवल २०-३०% छात्र ही सफल हो पाते थे।
विषय: यहाँ सिर्फ धर्म ही नहीं, बल्कि निम्नलिखित विषय पढ़ाए जाते थे:
दर्शनशास्त्र: बौद्ध दर्शन, हिन्दू दर्शन
तर्कशास्त्र (Logic)
व्याकरण
चिकित्सा शास्त्र (आयुर्वेद)
गणित और खगोलशास्त्र
राजनीति शास्त्र
वास्तुकला और मूर्तिकला
अर्थशास्त्र
शिक्षण पद्धति: शिक्षा व्याख्यान, वाद-विवाद और समूह चर्चा के माध्यम से होती थी। वाद-विवाद को विशेष महत्व दिया जाता था।
प्रसिद्ध शिक्षक और विद्यार्थी
नालंदा ने कई महान विद्वानों को जन्म दिया और आकर्षित किया:
नागार्जुन: महान बौद्ध दार्शनिक
आर्यभट्ट: प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और गणितज्ञ
वसुबंधु
धर्मपाल: जो बाद में विश्वविद्यालय के कुलपति बने
चीनी यात्री ह्वेन त्सांग और इ-त्सिंग: उन्होंने यहाँ वर्षों तक अध्ययन किया और अपने यात्रा वृतांतों में नालंदा का विस्तृत वर्णन किया।
भाग 3: धर्मगंज पुस्तकालय: ज्ञान का अथाह भंडार
नालंदा का पुस्तकालय, 'धर्मगंज', अपने आप में एक अजूबा था।
नौ मंजिला इमारत: यह पुस्तकालय एक विशाल नौ मंजिला इमारत में स्थित था।
तीन भवन: पुस्तकालय के तीन मुख्य भवन थे - रत्नसागर, रत्नोदधि, और रत्नरंजक।
हजारों पांडुलिपियाँ: इसमें लाखों की संख्या में पांडुलिपियाँ संग्रहित थीं, जो विभिन्न विषयों पर आधारित थीं।
अग्नि की भेंट: इसी पुस्तकालय को आक्रमणकारियों ने आग के हवाले कर दिया था। कहा जाता है कि यह आग तीन महीने से अधिक समय तक जलती रही, क्योंकि किताबें ही किताबें थीं।
भाग 4: पतन और विनाश (1193 ईस्वी)
नालंदा के विनाश की कहानी दुखद और हृदयविदारक है।
आक्रमणकारी: तुर्क सेनापति बख्तियार खिलजी ने 1193 ई. में इस पर हमला किया।
कारण: एक स्थानीय व्यक्ति ने खिलजी को बताया कि नालंदा में ऐसे ज्ञान का भंडार है जो इस्लामिक सिद्धांतों के विपरीत है। कहा जाता है कि खिलजी बीमार पड़ा और नालंदा के वैद्यों ने उसे ठीक नहीं किया, जिससे क्रोधित होकर उसने विश्वविद्यालय को नष्ट करने का आदेश दे दिया।
विनाश: हजारों बौद्ध भिक्षुओं और विद्वानों का कत्लेआम किया गया और धर्मगंज पुस्तकालय को जला दिया गया।
ज्ञान की हानि: मानव इतिहास का एक बहुमूल्य ज्ञान-भंडार सदा के लिए नष्ट हो गया।
भाग 5: नालंदा का पुनर्जन्म: आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय
पुराने नालंदा की भावना को फिर से जीवित करने का प्रयास किया गया है।
स्थापना: 2010 में राजगीर के पास नए नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की गई।
उद्देश्य: पुराने नालंदा की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए एशियाई देशों के बीच शैक्षणिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना।
पाठ्यक्रम: इतिहास, पर्यावरण अध्ययन, बौद्ध अध्ययन, दर्शन और सामाजिक विज्ञान जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं।
भाग 6: यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल
मान्यता: 2016 में नालंदा विश्वविद्यालय के पुरातात्विक अवशेषों को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।
महत्व: यह मान्यता इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को वैश्विक स्तर पर पुष्ट करती है।
निष्कर्ष: एक अमर विरासत
नालंदा विश्वविद्यालय सिर्फ ईंट और पत्थरों का ढेर नहीं था; यह मानव जिज्ञासा, बौद्धिक उत्कृष्टता और सीखने की असीम ललक का प्रतीक था। इसका विनाश मानव इतिहास की एक बड़ी त्रासदी है, लेकिन इसकी कहानी आज भी हमें प्रेरणा देती है। यह हमें सिखाती है कि ज्ञान सबसे बड़ी शक्ति है और उसे संजोकर रखना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी।
आज जब हम नालंदा के खंडहरों में खड़े होते हैं, तो हमें हवा में उस ज्ञान की गूँज सुनाई देती है, जो कभी यहाँ गूँजता था। नालंदा की यही 'गूँज' उसे अमर बनाती है।
